UGC Latest Data Mandate: सिर्फ नई डेटा इस्तेमाल करने का नया नियम, लाखों छात्र क्यों सड़कों पर उतर आए?

 

नई दिल्ली, 26 जनवरी 2026: गणतंत्र दिवस के दिन जहां पूरा देश परेड और झंडे फहराने में डूबा हुआ है, वहीं उच्च शिक्षा के गलियारों में तूफान खड़ा हो गया है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी UGC ने कल देर रात एक नोटिफिकेशन जारी किया जिसमें साफ-साफ कहा गया है कि अब सभी विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और रिसर्च इंस्टीट्यूट्स में थीसिस, प्रोजेक्ट्स और अकादमिक पेपर्स के लिए सिर्फ लेटेस्ट डेटा का ही इस्तेमाल अनिवार्य होगा। पुराने या ऐतिहासिक डेटा को प्राइमरी सोर्स के तौर पर मान्यता नहीं दी जाएगी।
ये UGC latest data mandate क्या है, इसे समझने से पहले ये जान लीजिए कि इसके खिलाफ सोशल मीडिया से लेकर कैंपस तक गुस्सा फूट पड़ा है। दिल्ली, बनारस, जादवपुर, जेएनयू, हैदराबाद और जयपुर तक छात्र सड़कों पर हैं। हैशटैग #UGCLatestDataBan और #SaveOurResearch ट्रेंड कर रहे हैं। लाखों छात्रों का कहना है कि ये नियम उनकी सालों की मेहनत पर पानी फेर देगा।

क्या हुआ है आखिर?

UGC Latest Data Mandate

UGC की नई गाइडलाइन के मुताबिक, 2026-27 सेशन से लागू होने वाले इस नियम में “लेटेस्ट डेटा” की परिभाषा दी गई है – पिछले 8-10 साल के भीतर इकट्ठा किया गया डेटा ही प्राइमरी माना जाएगा। अगर कोई छात्र इतिहास, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र या पुरातत्व जैसे विषयों में पुराने सर्वे, जनगणना या ऐतिहासिक रिकॉर्ड्स का इस्तेमाल करना चाहे तो उसे स्पेशल परमिशन लेनी पड़ेगी और वो भी सेकंडरी सोर्स के तौर पर।

भारत समाचार

UGC का कहना है कि ये कदम इसलिए उठाया गया है ताकि भारतीय रिसर्च ज्यादा करंट, रिलेवेंट और ग्लोबल स्टैंडर्ड के मुताबिक बने। आयोग के एक सीनियर अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “दुनिया तेजी से बदल रही है। पुराने डेटा पर आधारित रिसर्च से पॉलिसी मेकिंग में दिक्कत आती है। हम चाहते हैं कि हमारे छात्र आज की समस्याओं पर फोकस करें।”

क्यों भड़के हैं छात्र?

दरअसल, ये UGC latest data mandate कई विषयों के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। इतिहास के एक PhD छात्र ने मुझे फोन पर बताया, “मैं पिछले चार साल से 19वीं सदी के राजस्थान के भूमि सुधार पर काम कर रहा हूं। मेरे सारे प्राइमरी सोर्स ब्रिटिश काल के दस्तावेज हैं। अब ये नियम लागू हुआ तो मेरी पूरी थीसिस बेकार हो जाएगी। दोबारा डेटा कलेक्ट करने का न पैसा है, न समय।”

समाजशास्त्र और एन्थ्रोपोलॉजी के छात्र तो और ज्यादा परेशान हैं। एक जेएनयू की छात्रा ने सोशल मीडिया पर लिखा, “हम आदिवासी समुदायों के पारंपरिक ज्ञान पर रिसर्च करते हैं, जो सदियों पुराना है। लेटेस्ट डेटा से हम उनकी संस्कृति को कैसे समझेंगे?”

यहां तक कि इकोनॉमिक्स के छात्र भी चिंतित हैं। पुरानी जनगणना या लॉन्ग-टर्म ट्रेंड्स बिना उनकी स्टडी अधूरी रह जाएगी। विज्ञान के कुछ क्षेत्रों में तो ये नियम ठीक है, लेकिन ह्यूमैनिटीज और सोशल साइंसेज में ये जैसे मौत की सजा है।

पृष्ठभूमि: ये नियम आया कहां से?

पिछले कुछ सालों में ग्लोबल रैंकिंग्स में भारतीय यूनिवर्सिटी पीछे रह रही हैं। NIRF और QS रैंकिंग में रिसर्च इंपैक्ट कम होने की एक बड़ी वजह पुराने डेटा पर आधारित पेपर्स को बताया जाता है। UGC ने NEP 2020 के तहत मल्टीडिसिप्लिनरी और करंट रिसर्च को बढ़ावा देने का वादा किया था। इसी कड़ी में UGC latest data mandate को लाया गया है।

सूत्रों की मानें तो ये विचार सबसे पहले 2024 में आया था जब कुछ इंटरनेशनल जर्नल्स ने भारतीय रिसर्च पेपर्स को “आउटडेटेड डेटा” के कारण रिजेक्ट किया। फिर UGC ने कई विश्वविद्यालयों से फीडबैक मांगा, लेकिन ज्यादातर फीडबैक ह्यूमैनिटीज डिपार्टमेंट्स से नेगेटिव था। फिर भी आयोग ने इसे लागू कर दिया।

असर: किस पर क्या पड़ेगा?

सबसे बड़ा असर लाखों PhD और MPhil छात्रों पर पड़ेगा। अनुमान है कि देश में इस समय करीब 6-7 लाख छात्र रिसर्च कर रहे हैं, जिनमें से आधे से ज्यादा ह्यूमैनिटीज और सोशल साइंसेज में हैं। उनकी थीसिस में रिविजन, नए डेटा कलेक्शन और फील्ड वर्क का खर्चा बढ़ जाएगा। कई छात्रों को एक-दो साल एक्स्ट्रा लग सकते हैं।

विश्वविद्यालयों पर भी दबाव आएगा। छोटे-मोटे कॉलेजों में पहले से रिसर्च फैसिलिटी कम है, अब लेटेस्ट डेटा इकट्ठा करने के लिए उन्हें नई लैब्स, सर्वे टीम और फंडिंग चाहिए। ग्रामीण इलाकों के कॉलेज सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे।

पब्लिक पॉलिसी पर भी असर पड़ेगा। अगर रिसर्च सिर्फ हाल के डेटा पर होगी तो लॉन्ग-टर्म ट्रेंड्स समझने में दिक्कत आएगी। कई एक्सपर्ट्स का मानना है कि इससे भारत की हेरिटेज और कल्चरल स्टडीज कमजोर पड़ जाएंगी।

प्रतिक्रियाएं: कौन क्या कह रहा है?

सोशल मीडिया पर छात्रों का गुस्सा साफ दिख रहा है। एक छात्र ने लिखा, “UGC latest data mandate से हमारी डिग्री तो मिल जाएगी, लेकिन हमारा इतिहास खो जाएगा।” कई यूनिवर्सिटी स्टूडेंट यूनियंस ने 28 जनवरी से देशव्यापी प्रदर्शन की घोषणा कर दी है।

कुछ प्रोफेसर्स इसका समर्थन कर रहे हैं। दिल्ली यूनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर ने कहा, “साइंस और टेक्नोलॉजी में ये जरूरी है। पुराने डेटा से इनोवेशन नहीं होता। लेकिन ह्यूमैनिटीज के लिए अलग प्रावधान होना चाहिए था।”

विपक्षी पार्टियां भी मैदान में कूद पड़ी हैं। कांग्रेस ने इसे “कल्चरल हेरिटेज पर हमला” बताया है। वहीं सरकार की तरफ से अभी चुप्पी है। शिक्षा मंत्रालय के सूत्र बता रहे हैं कि जल्द ही कोई बयान आ सकता है।

आगे क्या हो सकता है?

कई छात्र संगठन सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी कर रहे हैं। उनका कहना है कि ये नियम संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और 21 (शिक्षा का अधिकार) का उल्लंघन है। UGC शायद कुछ संशोधन करे, जैसे ह्यूमैनिटीज के लिए छूट या ट्रांजिशन पीरियड बढ़ाए।

एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर ये नियम सख्ती से लागू हुआ तो आने वाले सालों में ह्यूमैनिटीज में PhD रजिस्ट्रेशन काफी कम हो सकता है। छात्र साइंस और टेक्नोलॉजी की तरफ शिफ्ट करेंगे।

अंत में…

UGC latest data mandate का मकसद अच्छा हो सकता है – रिसर्च को आधुनिक और रिलेवेंट बनाना। लेकिन जिस तरह से इसे लागू किया गया, वो छात्रों की सालों की मेहनत और भारत की विविध अकादमिक विरासत दोनों को नुकसान पहुंचा सकता है। जरूरत है संतुलन की। उम्मीद करें कि UGC छात्रों की आवाज सुने और जरूरी बदलाव करे। वरना ये विवाद और बड़ा हो सकता है।

सारांश:
UGC latest data mandate के तहत अब रिसर्च में सिर्फ पिछले 8-10 साल का डेटा ही प्राइमरी माना जाएगा। ह्यूमैनिटीज और सोशल साइंसेज के लाखों छात्र परेशान हैं क्योंकि उनकी थीसिस प्रभावित हो रही है। देशभर में प्रदर्शन शुरू हो गए हैं और कोर्ट जाने की तैयारी चल रही है। UGC का कहना है कि इससे रिसर्च ज्यादा करंट बनेगी, लेकिन छात्र इसे अपनी मेहनत पर हमला बता रहे हैं।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *