कॉकरोच आंदोलन सोमवार को अपने अब तक के सबसे बड़े और सबसे उग्र रूप में सामने आया। दिल्ली के जंतर-मंतर से शुरू होकर संसद भवन तक पहुंचने की कोशिश कर रहे 10 हजार से ज्यादा प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए पुलिस को आंसू गैस के गोले और लाठीचार्ज तक का सहारा लेना पड़ा। यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ इस आंदोलन की अब तक की सबसे बड़ी चुनौती मानी जा रही है।
पुलिस बल भी पड़ गया कम, अचानक उमड़ी भारी भीड़
रिपोर्ट्स के मुताबिक सोमवार के मार्च में प्रदर्शनकारियों की संख्या पुलिस के अनुमान से कहीं ज्यादा निकली, जिसके चलते तैनात सुरक्षाबल शुरुआत में संख्या में प्रदर्शनकारियों से पीछे पड़ गए। हजारों की भीड़ ने जंतर-मंतर के आसपास लगाई गई सुरक्षा बैरिकेडिंग तोड़ने की कोशिश की, जिसके बाद पुलिस ने अतिरिक्त बल बुलाकर स्थिति पर काबू पाया। झड़प के दौरान पुलिस की कार्रवाई में करीब 70 प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया, जबकि झड़प में 118 पुलिसकर्मी और 60 से अधिक प्रदर्शनकारी घायल हुए हैं। कई प्रदर्शनकारियों के सिर और हाथ-पैर में गंभीर चोटें आईं, जिन्हें तुरंत अस्पताल पहुंचाया गया।
मौके पर मौजूद चश्मदीदों के मुताबिक शुरुआत में माहौल पूरी तरह शांतिपूर्ण था और लोग नारेबाजी करते हुए आगे बढ़ रहे थे, लेकिन जैसे ही अगली कतार के प्रदर्शनकारी बैरिकेड के करीब पहुंचे, धक्का-मुक्की शुरू हो गई और स्थिति कुछ ही मिनटों में तनावपूर्ण हो गई। कुछ वाहनों को भी नुकसान पहुंचाए जाने की खबरें हैं, जिसे लेकर दिल्ली पुलिस ने कड़ी कार्रवाई की चेतावनी दी है।
क्या है कॉकरोच आंदोलन और क्यों भड़का गुस्सा
युवाओं के नेतृत्व वाला यह आंदोलन ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के बैनर तले चल रहा है, जिसका नाम खुद सत्ताधारी पार्टी के नाम पर तंज कसते हुए रखा गया है। यह आंदोलन मेडिकल कॉलेजों और सरकारी नौकरियों की बड़ी प्रवेश परीक्षाओं में बार-बार सामने आए पेपर लीक मामलों को लेकर बीते करीब एक महीने से जंतर-मंतर पर जारी है। प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांगें हैं – केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा, परीक्षा प्रणाली में बड़े सुधार, और पेपर लीक के चलते आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को उचित मुआवजा। आंदोलन की अगुआई कर रहे CJP संस्थापक अभिजीत दीपके लगातार इन मांगों को लेकर मुखर रहे हैं।
वांगचुक की जबरन अस्पताल शिफ्टिंग से भड़का जनसैलाब
इस कॉकरोच आंदोलन को व्यापक जनसमर्थन तब मिला जब बीते शनिवार को पुलिस जलवायु कार्यकर्ता और शिक्षाविद सोनम वांगचुक को जबरन अस्पताल ले गई। 59 वर्षीय वांगचुक पिछले तीन हफ्तों से आंदोलन के समर्थन में भूख हड़ताल पर बैठे थे और उनकी जबरन शिफ्टिंग को लेकर देशभर में नाराजगी फैल गई। इसी घटना के बाद सोमवार के मार्च में शामिल होने वालों की संख्या अचानक कई गुना बढ़ गई, जिससे यह आंदोलन की सबसे बड़ी और सबसे तीखी लामबंदी बन गया।
दिल्ली से बाहर भी फैला विरोध
दिल्ली के अलावा देश के कई अन्य शहरों में भी CJP समर्थकों ने विश्वविद्यालयों और सार्वजनिक स्थानों पर रैलियां और प्रदर्शन किए। छात्र संगठनों ने कैंपस स्तर पर सांकेतिक भूख हड़ताल और मार्च आयोजित कर आंदोलन के प्रति एकजुटता दिखाई। सोशल मीडिया पर भी #CockroachMovement और वांगचुक की रिहाई से जुड़े हैशटैग दिनभर ट्रेंड करते रहे, जिससे यह आंदोलन राजधानी की सीमाओं से बाहर निकलकर राष्ट्रीय मुद्दा बनता जा रहा है।
सरकार से मुलाकात, फिर भी अनिश्चितता बरकरार
इसी बीच CJP प्रतिनिधिमंडल की केंद्रीय मंत्री जे.पी. नड्डा से भी मुलाकात हुई, जिसमें प्रदर्शनकारियों ने अपनी मांगों से जुड़ा ज्ञापन सौंपा। हालांकि मुलाकात के बाद भी सरकार की तरफ से किसी मांग पर तुरंत या लिखित आश्वासन नहीं मिला, जिससे प्रदर्शनकारियों में असंतोष बना हुआ है। आंदोलन से जुड़े नेताओं का कहना है कि जब तक मांगें पूरी नहीं होतीं, तब तक जंतर-मंतर पर धरना जारी रहेगा।
सोशल मीडिया और अंतरराष्ट्रीय मीडिया की भी नजर
सोमवार की झड़प की तस्वीरें और वीडियो न सिर्फ भारतीय बल्कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी सुर्खियां बनीं। कई विदेशी समाचार एजेंसियों ने इसे मोदी सरकार के खिलाफ आंदोलन की अब तक की सबसे बड़ी चुनौती करार दिया। मानवाधिकार संगठनों ने भी पुलिस बल प्रयोग पर चिंता जताते हुए संयम बरतने की अपील की है, जबकि प्रशासन का कहना है कि बैरिकेड तोड़ने और अव्यवस्था फैलाने की कोशिश के बाद ही सुरक्षा बलों को कार्रवाई करनी पड़ी।
पिछले बड़े छात्र आंदोलनों से तुलना
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कॉकरोच आंदोलन बीते कुछ सालों में देश में देखे गए सबसे बड़े युवा-नेतृत्व वाले आंदोलनों में से एक बनता जा रहा है। पहले भी नीट और अन्य प्रवेश परीक्षाओं में गड़बड़ियों को लेकर छात्र संगठनों ने छिटपुट विरोध प्रदर्शन किए थे, लेकिन इस बार आंदोलन को जिस तरह देशभर के विश्वविद्यालयों, किसान संगठनों और विपक्षी दलों का साथ मिल रहा है, वह इसे अलग बनाता है।
सोमवार के मार्च में शामिल कई छात्रों का कहना था कि वे सिर्फ पेपर लीक ही नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में लंबे समय से चली आ रही खामियों के खिलाफ भी आवाज उठा रहे हैं। विश्लेषकों के मुताबिक अगर सरकार जल्द ठोस कदम नहीं उठाती, तो आने वाले हफ्तों में यह आंदोलन और बड़ा रूप ले सकता है।
आगे क्या होगा
फिलहाल हिरासत में लिए गए ज्यादातर प्रदर्शनकारियों को बाद में छोड़ दिया गया है, लेकिन आंदोलन को लेकर माहौल अब भी गरम है। सोनम वांगचुक की सेहत, उनकी रिहाई से जुड़ी अदालती कार्यवाही और सरकार के अगले कदम पर सबकी नजरें टिकी हैं। शिक्षा और परीक्षा सुधार से जुड़ी सरकारी जानकारी के लिए शिक्षा मंत्रालय की वेबसाइट देखी जा सकती है।
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